Monday, 29 July 2013

kaise hum kaise tum ??

मिलकर भी फ़ासला लिए बैठे हैं दरमियाँ
छुपा रखा हो न जाने क्या अपने अन्दर जैसे /
उसमें मुझमें फ़र्क है बस ज़रा सा ' तनहा '
वो हो खामोश नदी कोई औ' मैं समंदर जैसे

shakhs akela sa !!

दुनिया भर की दुश्वारियां जब घेर लें दामन दामन
गमगुसार जो हो कोई दरकार मेरे बारे में सोचना /
इस तरह हुजूम में रहकर न समझ पाओगे ज़रा भी
कभी रात की तन्हाई में बैठकर मेरे बारे में सोचना

Monday, 10 June 2013



मेरी मोहब्बत के अफसाने का मामला कोई खास नहीं है /
उसी की तलाश में हूँ जिसके मिलने की कोई आस नहीं है

meri mohabbat ke afsane ka mamla koi khas nahi hai /
usee ki talash meiN huN jiske milne ki koi aas nahi hai

THE QUEST

किसी शहर में भी मुझको अपना कोई हमसफ़र न मिला
मकाँ ही मकाँ मिले हर तरफ अपना कोई घर न मिला
.
अंजान शहर में लोगों ने पा लिए रिश्ते कैसे ये बेशुमार
मुझको अपने ही घर में आशना कोई मगर ना मिला
.
मैं ही ग़ुलाम बनकर रहा अपनों का और गैरों का भी
मेरे आगे जो झुक जाता कभी ऐसा कोई सर न मिला
.
रुसवाईओं के शहर में सबसे ज़्यादा रुसवा भी मैं ही था
औ' तन्हाईयों के शहर में मुझसा तनहा कोई बशर न मिला

MOHABBAT

MOHABBAT ..

मोहब्बत क्या है ?..
मुझसे जो तुम पूछते हो " मोहब्बत की हकीक़त"
तो क्या मैं मान लूं
जो मैं कहूँगा  वो तुम मानोगे
जो अब तलक माना है तुमने
क्या उसे छोड़कर कुछ और जानोगे ?

मोहब्बत की हकीक़त --
ये नहीं है किसी मंदिर में
सुबह और शाम की आरती जैसी
और न ही मस्जिद में
पांच वक़्त नमाज़ पढ़ लेने जैसी है
ये नहीं है ढोंग आडम्बर या दिखावा ही कोई
ये नहीं है किसी भी
पल दो पल की ख़ुशी जैसी
मौजूद  रहती है ये हर पल
पर दिखाई नहीं देती
बिन रुके जो मुसलसल
बहती रहे रूह में बेखुदी जैसी

मोहब्बत की हकीक़त --
ये किसी से नहीं है पर इससे हैं सब
कहकशां चाँद तारे मैं और तुम
फूल में भी और खार में भी ये
ये है किसी जादूगरी जैसी
तालीम इसकी हर कंही
पर इसकी नहीं कोई किताब
आज़ाद है हर दायरे  से
ये नहीं मजबूरी के जैसी
इस पर नहीं है जोर पैसे का या ताक़त का
नाज़ुक होकर भी सनम
ये है फौलाद के जैसी

मोहब्बत की हकीक़त --

एक से है ये तो ये "नहीं है"
सबसे ग़र ये है तो "है"
इसमे नहीं है तेरा मेरा
"हम" हैं जिसमें ये वैसी है
बोलो क्या तुम अपनी 'सोच' को
थोडा बदल भी पाओगे
ज़र्रे ज़र्रे को दोगे चाहत
क्या अपनी औलाद के जैसी ?

जो हम तुम जानते हैं
उसको मोहब्बत मानती नहीं है
इसको मालूम ही नहीं है शै कोई
हिन्दू और मुस्लमान के जैसी
ये है बेहद  भोली भाली सी
सच्चे किसी इंसान के जैसी

ये है बेहद  भोली भाली सी
सच्चे किसी इंसान के जैसी ..

Tuesday, 19 February 2013

mere bus ki baat nahi . ...

हुस्न की नगरी से बामुश्किल बिन झुलसे हुए हम लौटे हैं ,
इस आग को दूर ही रहने दो अब फिर से हाथ जलाये कौन ?
.
हर आशना का लेखा जोखा जब बस धोखा धोखा धोखा हो ,
क्यूँ खुद में सिमटे न रह जायें अब फिर से हाथ मिलाये कौन ?
.
वो जो इशारा करते थे मुझे जो बन के सहारा मिलते थे ,
आँखों से ओझल हुए कबके अब फिर से हाथ हिलाए कौन ?
.
कहा नुजूमी ने था मेरा हाथ देखकर वो मेरे थे वो मेरे हैं ,
वही चले गए जब हाथ छोड़कर अब फिर से हाथ दिखाए कौन?

Monday, 4 February 2013

contrast

किसी को हंसा दूँ ,किसीको दूँ दिलासा ,

मेरी नमाजें यूं अदा होती हुई /

देख मेरी शख्सियत का कुछ भी बिगड़ा नहीं ,

ये तेरी ही बद -दुआ है खता होती हुई /

कंही फरेब ,कंही छलावा ,कंही मक्कारी ,

ज़माने की भी क्या खूब वफ़ा होती हुई /

बदल दिया है ज़माने ने तनहा को भी ,

मेरी ही ज़िन्दगी आज मुझसे खफा होती हुई .